उमाशंकर पांडेय बताते हैं कि जल संरक्षण की प्रेरणा उन्हें दिल्ली में प्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र से मिली और उसी के बाद उन्होंने इसका
प्रयोग अपने गांव में करना शुरू कर दिया. पांडेय के मुताबिक, "हमने किसी भी
तालाब के किनारे को पक्का नहीं किया है बल्कि जैसा था, वैसा ही रहने दिया गया है. पक्का करने पर पानी ज़मीन के अंदर नहीं जा पाता है. गांव में कुछ
और भी तालाब हैं जिन पर लोगों ने काफ़ी पहले से कब्ज़ा कर रखा है लेकिन हम लोगों ने पहले अपना ध्यान उन तालाबों पर केंद्रित किया जो चालू थे और यही
वजह है कि हमारे गांव में छह बड़े तालाब हैं जो पानी से भरे हैं."
जखनी गांव में शायद ही कोई ऐसा हैंडपंप हो जिसमें पानी न हो. इसकी वजह ये है कि गांव के अलावा इस पूरे इलाक़े में जल स्तर ऊपर उठ गया है. मामून अली बताते हैं कि उन लोगों की देखा-देखी आस-पास के गांव वालों ने भी अब ऐसा करना शुरू कर दिया है और बासमती धान की खेती करने लगे हैं.
बांदा के ज़िलाधिकारी हीरालाल का कहना है ज़िले में सभी गांवों को जखनी जैसा बनने के लिए प्रेरित किया जाता है. बीबीसी से बातचीत में उनका कहना था, "हम लोग अपने ज़िले में तालाब और कुंओं के संरक्षण के लिए एक अभियान चला रहे हैं और इसके तहत जखनी को आदर्श गांव के तौर पर लोगों के सामने उदाहरण के लिए रखा जाता है."
400 से ज़्यादा फ़िल्मों में काम करने वाले अमरीश पुरी का 12 जनवरी, 2005 में निधन हुआ.
उनकी रौब भरी आवाज में बोला गया डायलॉग- मोगैंबो खुश हुआ आज भी लोगों की ज़ुबान पर छाया है.
लंबा चौड़ा क़द, दमदार आवाज़, डरावने गेटअप और ज़बरदस्त शख़्सियत के ज़रिए सालों तक फ़िल्म प्रेमियों के दिल में ख़ौफ़ पैदा करने वाले अभिनेता अमरीश पुरी के 83वें जन्मदिन पर उनके बेटे राजीव पुरी ने बीबीसी की सहयोगी मधु पाल से खास बातचीत में उनसे जुड़ी यादों को साझा किया था.
राजीव ने कहा, "मैं और मेरा पूरा परिवार उन्हें कई सालों से थिएटर करते देख चुके थे. हमें पता था कि वो सिर्फ किरदार निभाते हैं थिएटर में. लेकिन मेरे दोस्त जब मेरे घर आया करते थे, तब वो मेरे पिता की मौजूदगी में हमेशा सहमे हुए रहते थे. लगातार मिलने के बाद वो उन्हें बेहतर तरीके से समझने लगे और धीरे-धीरे उनका डर ख़त्म हो गया."
परदे पर कठोर दिखने वाले अमरीश पुरी क्या निजी ज़िन्दगी में भी ऐसे ही थे?
बकौल राजीव, "नहीं, मेरे पिता कठोर नहीं थे. वो एक हिम्मती इंसान थे. वो एक पारिवारिक आदमी थे. उन्हें अनुशासन में रहना पसंद था. उन्हें हर काम सही तरीके से करना पसंद था."
परदे पर कठोर दिखने वाले अमरीश पुरी क्या निजी ज़िन्दगी में भी ऐसे ही थे?
बकौल राजीव, "नहीं, मेरे पिता कठोर नहीं थे. वो एक हिम्मती इंसान थे. वो एक पारिवारिक आदमी थे. उन्हें अनुशासन में रहना पसंद था. उन्हें हर काम सही तरीके से करना पसंद था."
राजीव पुरी बताते हैं, "पापा को 40 साल की उम्र में फ़िल्मों में पहचान मिली. उनके जैसे किरदार और जिस तरह से वो अपने किरदार के चहरे बदलते थे वो अब तक कोई नहीं कर पाया हैं. आज के दौर में एक खलनायक के तौर पर किसी में इस तरह के एक्सपेरिमेंट करने की हिम्मत नहीं हैं."
अमरीश पुरी ने 'नसीब', 'विधाता', 'हीरो', 'अंधा कानून', 'अर्ध सत्य', 'हम पांच' और 'ग़दर' जैसी फिल्मों में बतौर खलनायक ऐसी छाप छोड़ी कि फ़िल्म प्रेमियों के मन में उनके नाम से ही ख़ौफ़ पैदा हो जाता था.
साल 1987 में फ़िल्म 'मिस्टर इंडिया' में उनका किरदार 'मोगैम्बो' बेहद मशहूर हुआ. फ़िल्म का संवाद 'मोगैम्बो खुश हुआ', आज भी लोगों के ज़ेहन में बरक़रार है.
उनकी फ़िल्मों को याद कर राजीव ने बताया," मुझे अपने पापा की आठ फ़िल्में बेहद पसंद हैं. 'विरासत', 'घातक' ,'कोयला', 'त्रिदेव', 'विश्वात्मा', 'मिस्टर इंडिया', 'ग़दर' और 'नागिन'. फ़िल्म 'नागिन' में उन्होंने तांत्रिक का ऐसा किरदार निभाया जिसे मैं आज तक भुला नहीं पाया हूँ."
जखनी गांव में शायद ही कोई ऐसा हैंडपंप हो जिसमें पानी न हो. इसकी वजह ये है कि गांव के अलावा इस पूरे इलाक़े में जल स्तर ऊपर उठ गया है. मामून अली बताते हैं कि उन लोगों की देखा-देखी आस-पास के गांव वालों ने भी अब ऐसा करना शुरू कर दिया है और बासमती धान की खेती करने लगे हैं.
बांदा के ज़िलाधिकारी हीरालाल का कहना है ज़िले में सभी गांवों को जखनी जैसा बनने के लिए प्रेरित किया जाता है. बीबीसी से बातचीत में उनका कहना था, "हम लोग अपने ज़िले में तालाब और कुंओं के संरक्षण के लिए एक अभियान चला रहे हैं और इसके तहत जखनी को आदर्श गांव के तौर पर लोगों के सामने उदाहरण के लिए रखा जाता है."
दिग्गज अभिनेता अमरीश पुरी का शनिवार को 87वां जन्मदिन है, इस मौके पर गूगल ने डूडल बनाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी है.
मिस्टर इंडिया, त्रिदेव, मेरी जंग, घायल जैसी फ़िल्मों के जरिए अपने अभिनय का
लोहा मनवाने वाले अमरीश पुरी का जन्म 22 जून, 1932 में लाहौर पाकिस्तान (तब
अविभाजित भारत) में हुआ था. 400 से ज़्यादा फ़िल्मों में काम करने वाले अमरीश पुरी का 12 जनवरी, 2005 में निधन हुआ.
उनकी रौब भरी आवाज में बोला गया डायलॉग- मोगैंबो खुश हुआ आज भी लोगों की ज़ुबान पर छाया है.
लंबा चौड़ा क़द, दमदार आवाज़, डरावने गेटअप और ज़बरदस्त शख़्सियत के ज़रिए सालों तक फ़िल्म प्रेमियों के दिल में ख़ौफ़ पैदा करने वाले अभिनेता अमरीश पुरी के 83वें जन्मदिन पर उनके बेटे राजीव पुरी ने बीबीसी की सहयोगी मधु पाल से खास बातचीत में उनसे जुड़ी यादों को साझा किया था.
राजीव ने कहा, "मैं और मेरा पूरा परिवार उन्हें कई सालों से थिएटर करते देख चुके थे. हमें पता था कि वो सिर्फ किरदार निभाते हैं थिएटर में. लेकिन मेरे दोस्त जब मेरे घर आया करते थे, तब वो मेरे पिता की मौजूदगी में हमेशा सहमे हुए रहते थे. लगातार मिलने के बाद वो उन्हें बेहतर तरीके से समझने लगे और धीरे-धीरे उनका डर ख़त्म हो गया."
परदे पर कठोर दिखने वाले अमरीश पुरी क्या निजी ज़िन्दगी में भी ऐसे ही थे?
बकौल राजीव, "नहीं, मेरे पिता कठोर नहीं थे. वो एक हिम्मती इंसान थे. वो एक पारिवारिक आदमी थे. उन्हें अनुशासन में रहना पसंद था. उन्हें हर काम सही तरीके से करना पसंद था."
परदे पर कठोर दिखने वाले अमरीश पुरी क्या निजी ज़िन्दगी में भी ऐसे ही थे?
बकौल राजीव, "नहीं, मेरे पिता कठोर नहीं थे. वो एक हिम्मती इंसान थे. वो एक पारिवारिक आदमी थे. उन्हें अनुशासन में रहना पसंद था. उन्हें हर काम सही तरीके से करना पसंद था."
राजीव पुरी बताते हैं, "पापा को 40 साल की उम्र में फ़िल्मों में पहचान मिली. उनके जैसे किरदार और जिस तरह से वो अपने किरदार के चहरे बदलते थे वो अब तक कोई नहीं कर पाया हैं. आज के दौर में एक खलनायक के तौर पर किसी में इस तरह के एक्सपेरिमेंट करने की हिम्मत नहीं हैं."
अमरीश पुरी ने 'नसीब', 'विधाता', 'हीरो', 'अंधा कानून', 'अर्ध सत्य', 'हम पांच' और 'ग़दर' जैसी फिल्मों में बतौर खलनायक ऐसी छाप छोड़ी कि फ़िल्म प्रेमियों के मन में उनके नाम से ही ख़ौफ़ पैदा हो जाता था.
साल 1987 में फ़िल्म 'मिस्टर इंडिया' में उनका किरदार 'मोगैम्बो' बेहद मशहूर हुआ. फ़िल्म का संवाद 'मोगैम्बो खुश हुआ', आज भी लोगों के ज़ेहन में बरक़रार है.
उनकी फ़िल्मों को याद कर राजीव ने बताया," मुझे अपने पापा की आठ फ़िल्में बेहद पसंद हैं. 'विरासत', 'घातक' ,'कोयला', 'त्रिदेव', 'विश्वात्मा', 'मिस्टर इंडिया', 'ग़दर' और 'नागिन'. फ़िल्म 'नागिन' में उन्होंने तांत्रिक का ऐसा किरदार निभाया जिसे मैं आज तक भुला नहीं पाया हूँ."
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